“When the world's attachments still exist, devotion does not arise. When Hari breaks those attachments, only the devotee remembers Him.”
जब तक व्यक्ति के सांसारिक लगाव बने रहते हैं, तब तक भक्ति संभव नहीं होती। जब हरि (ईश्वर) उन लगाव को तोड़ देते हैं, तब केवल भक्त ही उनका स्मरण करते हैं।
कबीर दास जी यहाँ समझा रहे हैं कि जब तक हमारा मन दुनियावी रिश्तों और मोह-माया के जाल में उलझा रहता है, तब तक सच्ची भक्ति का फूल खिल ही नहीं पाता। ये सांसारिक बंधन हमें ईश्वर से दूर भटकाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे घने बादल सूरज को ढक लेते हैं। वे कहते हैं कि जब भगवान हरि अपनी कृपा से इन बंधनों को हटाते हैं, तभी मन सच्चे अर्थों में उनकी याद में लीन होता है और हम असली भक्त कहलाते हैं।
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