ग़ज़ल
कबीर 71-80
کبیر 71-80
कबीर के इन दोहों में सच्ची भक्ति के लिए सांसारिक मोहमाया से वैराग्य की अनिवार्यता पर बल दिया गया है। वे एक भक्त के ईश्वर-नाम के प्रति गहरे प्रेम को विभिन्न प्राकृतिक और मानवीय संबंधों से तुलना करते हैं। इसके साथ ही, कबीर संसार में स्वार्थी लोगों के बीच हृदय के घावों के लिए सच्चा मरहम न मिलने की निराशा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि व्यक्ति का वास्तविक स्वभाव उसके वचनों और कर्मों से प्रकट होता है।
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1
जब लग नाता जगत का , तब लग भक्ति न होय। नाता तोड़े हरि भजे , भगत कहावें सोय॥ 74॥
जब तक व्यक्ति के सांसारिक लगाव बने रहते हैं, तब तक भक्ति संभव नहीं होती। जब हरि (ईश्वर) उन लगाव को तोड़ देते हैं, तब केवल भक्त ही उनका स्मरण करते हैं।
2
जल ज्यों प्यारा माहरी , लोभी प्यारा दाम। माता प्यारा बारका , भगति प्यारा नाम॥ 75॥ ~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
जल की तरह प्यारा माथे (या रूप), और लोभ से भरा प्यारा दाम (या धन); माता की गोद जैसा प्यारा स्थान, और भक्ति का प्यारा नाम।
3
दिल का मरहम ना मिला , जो मिला सो गर्जी। कह कबीर आसमान फटा , क्योंकर सीवे दर्जी॥ 76॥
दिल का मरहम तो नहीं मिला, बस एक शोर मिला। कबीर कहते हैं कि अगर आसमान फटा भी, तो दर्जी उसे क्यों सिल देगा।
4
बानी से पह्चानिये , साम चोर की घात। अन्दर की करनी से सब , निकले मुँह कई बात॥ 77॥
बोलने के तरीके से चोर की योजना का पता चलता है, लेकिन अंदर के कार्यों से कई बातें बाहर आती हैं।
5
जब लगि भगति सकाम है , तब लग निष्फल सेव। कह कबीर वह क्यों मिले , निष्कामी तज देव॥ 78॥
जब तक भक्ति सकाम है, तब तक सेवा निष्फल है। कबीर कहते हैं, वह क्यों मिले, निष्कामी तज देव।
6
फूटी आँख विवेक की , लखे ना सन्त असन्त। जाके संग दस-बीस हैं , ताको नाम महन्त॥ 79॥
विवेक की आँख जब टूट जाती है, तो वह संत और असंत में भेद नहीं कर पाती। जिस व्यक्ति के दस या बीस साथी होते हैं, उसे महन्त कहा जाता है।
7
दाया भाव ह्र्दय नहीं , ज्ञान थके बेहद। ते नर नरक ही जायेंगे , सुनि-सुनि साखी शब्द॥ 80॥
यदि हृदय करुणा के भाव से और असीम ज्ञान से भरा नहीं है, तो वे मनुष्य निश्चित रूप से नरक में जाएंगे; मैं यह साखी शब्द-दर-शब्द कहता हूँ।
8
दाया कौन पर कीजिये , का पर निर्दय होय। सांई के सब जीव है , कीरी कुंजर दोय॥ 81॥
हे दया! तुम किस पर ऐसा निर्दयता करोगी? सांवली (साँई) के सभी जीव हैं; हाथी और भैंसा दोनों उसके हैं।
9
जब मैं था तब गुरु नहीं , अब गुरु हैं मैं नाय। प्रेम गली अति साँकरी , ता मे दो न समाय॥ 82॥
जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय। प्रेम गली अति साँकरी, ता मे दो न समाय। इस दोहे का अर्थ है कि जब मेरा कोई गुरु नहीं था, तब मैं स्वयं में था, लेकिन अब गुरु के आने से मैं स्वयं में नहीं रहा। प्रेम का मार्ग बहुत संकरा है, जिसमें दो लोग एक साथ नहीं रह सकते।
10
छिन ही चढ़े छिन ही उतरे , सो तो प्रेम न होय। अघट प्रेम पिंजरे बसे , प्रेम कहावे सोय॥ 83॥
जो चीज़ पल भर में ऊपर जाती है और पल भर में नीचे आ जाती है, वह प्रेम नहीं है। गहरे प्रेम के पिंजरे में, प्रेम स्वयं सो रहा है।
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