“Only those can be the glory of gatherings, Who don't even call desolation a lonely place.”
केवल वही लोग सभाओं की शोभा बन सकते हैं, जो वीराने को भी सूनी जगह नहीं कहते।
यह प्यारा शेर हमें बताता है कि महफिलों की असली रौनक वे लोग होते हैं जो अपने भीतर की रोशनी से चमकते हैं। वे ऐसे लोग हैं जो बंजर और खाली जगह को भी सूना नहीं कहते, क्योंकि वे अपने भीतर ही खुशी या साथ ढूंढ लेते हैं। उन्हें जीवंत महसूस करने या व्यस्त रहने के लिए बाहरी शोर-शराबे की ज़रूरत नहीं होती। इसके बजाय, वे अपनी गर्मजोशी, समझदारी और खुशमिजाजी हर जगह ले जाते हैं, जिस भी माहौल में जाते हैं उसे समृद्ध कर देते हैं। उनकी मौजूदगी एक साधारण मुलाकात को भी कुछ ख़ास और सम्मानजनक बना देती है, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वे संतोष और आत्मनिर्भरता की भावना से भरे होते हैं जो हर जगह चमकती है।
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