ग़ज़ल
हरि तुम हरो जन की भीर
ہری تم ہرو جن کی بھیڑ
यह भक्तिमय ग़ज़ल भगवान हरि से अपने भक्तों के कष्ट हरने की मार्मिक प्रार्थना है। यह द्रौपदी की लाज बचाने और भक्त प्रहलाद के लिए नरसिंह रूप धारण कर हिरण्यकश्यप को मारने जैसे पूर्व चमत्कारों का स्मरण कराती है, जो भक्तों के लिए उनके दिव्य हस्तक्षेप के उदाहरण हैं।
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दासि 'मीरा लाल गिरिधर, दु:ख जहाँ तहँ पीर॥
मीरा, भगवान गिरिधर की दासी, कहती हैं कि जहाँ दुःख होता है, वहाँ पीड़ा भी अवश्य होती है।
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