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ग़ज़ल

पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो

پایا جی میں نے تو رام رتن دھن پایا
मीराबाई· Ghazal· 6 shers

“पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो” यह भजन मीराबाई के उस गहरे आध्यात्मिक अनुभव को व्यक्त करता है, जहाँ वे प्रभु राम के नाम रूपी अमूल्य रत्न को पाने की घोषणा करती हैं। वे बताती हैं कि यह अविनाशी धन उन्हें अपने सद्गुरु की कृपा से मिला है, जो सांसारिक संपत्तियों से कहीं अधिक मूल्यवान है। यह आध्यात्मिक निधि न तो खर्च करने से कम होती है और न ही चोर इसे चुरा सकता है, बल्कि यह दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है।

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1
पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।
मैंने तो राम रतन रूपी धन पा लिया है। यह भगवान राम के नाम में अमूल्य आध्यात्मिक संपत्ति खोजने का प्रतीक है।
2
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥
मेरे सतगुरु ने मुझे एक अनमोल वस्तु दी और कृपा करके मुझे अपना बना लिया।
3
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
मैंने अनेक जन्मों की पूँजी प्राप्त कर ली है, और इस संसार में बाकी सब कुछ खो दिया है।
4
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
यह खर्च करने पर खत्म नहीं होता है और न ही चोर इसे लूट सकते हैं। यह दिन-ब-दिन बढ़ता ही जाता है।
5
सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
जब सतगुरु सत्य की नाव के खेवनहार होते हैं, तब व्यक्ति भवसागर को पार कर जाता है।
6
'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥
मीरा के प्रभु गिरिधर हैं, जो चतुर (नागर) हैं, और मीरा ने अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक उनका यशगान किया।
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