वस्फ़-ए-दहन से उस के न आगे क़लम चले
या'नी क्या है ख़ामे ने ख़त्म कलाम याँ
“From the burning passion, not even a pen can move beyond her; what is the flaw, O poet, in this finished verse?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
उसके वस्फ़-ए-दहन से तो आगे शायर का क़लम नहीं चल सकता; या शायर, क्या इसमें कोई ख़ामी है, या यह कलाम ही ख़त्म है।
विस्तार
यह शेर कला की पराकाष्ठा को छूता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि महबूब की तारीफ़ (वस्फ़-ए-दहन) इतनी गहरी है कि उसके आगे तो कलम भी थम जाती है। वो पूछते हैं कि जब कला अपने शिखर पर है, तो क्या थोड़े से दोषों (ख़ामे) का कोई महत्व रह जाता है? यह तो पूर्णता का दावा है!
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