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बैठने कौन दे है फिर उस को
जो तिरे आस्ताँ से उठता है

Who will let him sit, after he rises from your threshold?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

बैठने कौन दे है फिर उस को, जो तिरे आस्ताँ से उठता है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि किसी को कौन बैठने देगा, जो तुम्हारे द्वार से उठता है।

विस्तार

यह शेर उस गहरे लगाव को बयां करता है जो कभी खत्म नहीं होता। शायर कह रहे हैं कि एक बार जब कोई इंसान किसी के आशियाने, उसके आस्ताँ से उठकर उसमें बस जाता है... तो उसे वापस बैठने की इजाज़त कोई नहीं देगा। यह उस रिश्ते की बात है जो रूह में बस जाए और जिसका वजूद अलग न किया जा सके।

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