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ग़ज़ल

देख तो दिल कि जाँ से उठता है

देख तो दिल कि जाँ से उठता है

यह ग़ज़ल बताती है कि दिल की जान से उठने वाला धुएँ जैसा शोर, या आसमाँ से उठता शोला, किस दिलजले की निशानी है। कवि कहता है कि दिल के घर से ज़ीनहार न जा, क्योंकि कोई ऐसा मकान है जहाँ से शोर आसमाँ की तरह उठता है।

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1
देख तो दिल कि जाँ से उठता है ये धुआँ सा कहाँ से उठता है
देख तो दिल की जान से उठता है, ये धुआँ सा कहाँ से उठता है। अर्थ: जब दिल की जान से यह धुआँ जैसा उठता है, तो यह धुआँ कहाँ से आता है।
2
गोर किस दिलजले की है ये फ़लक शोला इक सुब्ह याँ से उठता है
गोर किस दिलजले की है ये फ़लक, शोला इक सुब्ह याँ से उठता है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि यह आकाश किस हृदय के दुःख का है, और एक सुबह से ज्वाला उठती है।
3
ख़ाना-ए-दिल से ज़ीनहार न जा कोई ऐसे मकाँ से उठता है
दिल के घर से गहना न जा, कोई ऐसे ठिकाने से उठता है।
4
नाला सर खींचता है जब मेरा शोर इक आसमाँ से उठता है
जब मेरा दुख नाले की तरह बहता है, तो एक शोर आसमान से उठना शुरू हो जाता है।
5
लड़ती है उस की चश्म-ए-शोख़ जहाँ एक आशोब वाँ से उठता है
उसकी चुलबुली आँखों से, जहाँ दुनिया उसका मंच है, एक छोटा सा झगड़ा उठता है।
6
सुध ले घर की भी शोला-ए-आवाज़ दूद कुछ आशियाँ से उठता है
शायर कहता है कि घर की आवाज़ का शोला भी ध्यान में रखना, क्योंकि गाय के घोंसले से कुछ आवाज़ उठ रही है।
7
बैठने कौन दे है फिर उस को जो तिरे आस्ताँ से उठता है
बैठने कौन दे है फिर उस को, जो तिरे आस्ताँ से उठता है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि किसी को कौन बैठने देगा, जो तुम्हारे द्वार से उठता है।
8
यूँ उठे आह उस गली से हम जैसे कोई जहाँ से उठता है
यूँ उठे आह उस गली से हम, जैसे कोई जहाँ से उठता है।
9
इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है
इश्क़ एक भारी पत्थर है, मीर; यह कब तुम्हारी ना-तवाँ अवस्था से उठेगा।
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