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इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है

Love, O Meer, is a heavy stone, When will it rise from your inebriated state?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

इश्क़ एक भारी पत्थर है, मीर; यह कब तुम्हारी ना-तवाँ अवस्था से उठेगा।

विस्तार

मीर साहब ने इश्क़ को एक भारी पत्थर बताया है। शायर पूछ रहे हैं कि यह पत्थर कब हमारे दिल से उतरेगा, जब महबूब की रूह ही ना-तवाँ (अस्थिर) है। यह शेर सिर्फ प्यार की बात नहीं करता, यह उस दर्द को बयां करता है जो एक अस्थिर रिश्ते में रहता है। यह दिखाता है कि जब तक महबूब का मन नहीं बदलेगा, यह बोझ हमेशा रहेगा।

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