टुक ऐ मुद्द'ई चश्म-ए-इंसाफ़ वा कर
कि बैठे हैं ये क़ाफ़िए किस अदा से
“O pretender of the eye of justice, please do, / How these rhyming couplets sit with such grace.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
ऐ दावेदार न्याय की आँख, कृपा करो कि ये क़ाफ़िए किस अदा से बैठे हैं।
विस्तार
यह शेर Mir Taqi Mir की ज़बान से आया एक बेहतरीन साहित्यिक पल है। शायर यहाँ श्रोता को संबोधित करते हैं, जो न्याय की नज़रों से देख रहा है। और पूछते हैं कि ये काफ़िए... ये अल्फ़ाज़ किस अदा से, किस जादू से बैठे हैं! यह सिर्फ़ एक सवाल नहीं है, बल्कि कविता के रूप की सुंदरता और रहस्य का जश्न है। शायर हमें भाषा की गहराई को महसूस करने को कह रहे हैं।
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