ग़ज़ल 'मीर' की कब पढ़ाई नहीं
कि हालत मुझे ग़श की आई नहीं
“How is it that I never studied the ghazal of 'Mir'? That my condition did not bring me into a state of ecstasy.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
मीर की ग़ज़ल कब पढ़ी नहीं कि हालत मुझे ग़श की आई नहीं। (अर्थ: मैंने मीर की ग़ज़ल कब पढ़ी, कि मेरी हालत में ऐसा नहीं आया कि मुझे मदहोशी महसूस हो।)
विस्तार
यह शेर उस हालत को बयां करता है जब दिल का ज़ोर इतना बढ़ जाता है कि दिमाग़ किसी चीज़ पर ध्यान नहीं दे पाता। शायर कहते हैं कि जब आप किसी गहरे एहसास में डूबे होते हैं, तो न तो आप कोई किताब पढ़ सकते हैं, और न ही किसी कला को समझने की कोशिश कर सकते हैं। यह इश्क़ की उस बेबसी का इज़हार है!
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