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ज़बाँ से हमारी है सय्याद ख़ुश
हमें अब उमीद-ए-रिहाई नहीं

From our tongue comes the Sayyad's joy, / We have no more hope of freedom.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

हमारी ज़बान से सय्यद को खुशी मिलती है, पर अब हमें आज़ादी की कोई उम्मीद नहीं है।

विस्तार

यह शेर बहुत गहरे एहसास को बयां करता है। शायर कहते हैं कि अब ज़ुबान से जो भी निकलेगा, वह किसी के इर्द-गिर्द होगा, या किसी के मन मुताबिक होगा। लेकिन असली बात तो दूसरी लाइन में है—कि अब हमें आज़ादी की उम्मीद नहीं है। यह सिर्फ़ हार नहीं है, बल्कि एक तरह की शांतिमय कबूलियत है। जब इंसान को लगता है कि संघर्ष का कोई रास्ता नहीं बचा, तो वह इस तरह की बेबसी की स्थिति में पहुँच जाता है। यह एक बहुत ही दर्दभरा इज़हार है।

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