करूँ क्यूँके इंकार इश्क़ आह में
ये रोना भला क्या है गर कुछ नहीं
“Why should I deny the love in my sighs? / What is this crying if there is nothing at all?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
शायर कहता है कि वह अपनी आहों में प्रेम का इंकार क्यों करे? और यह रोना किस काम का है, अगर कुछ भी नहीं है।
विस्तार
मीर तक़ी मीर ने इश्क़ के उस गहरे विरोधाभास को पकड़ा है। वो पूछते हैं कि क्या इनकार करना मुमकिन है, जब दिल की हर आह ही एक इक़रार होती है। ये शेर सिर्फ आँसुओं की बात नहीं करता.... बल्कि ये उस दर्द की बात करता है जो कभी-कभी बिना वजह ही हमें रुला देता है। क्या रोना ज़रूरी है, या ये बस एक एहसास है?
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