क़िबला-ओ-का'बा ख़ुदा-वंद-ओ-मलाज़-ओ-मुशफ़िक़
मुज़्तरिब हो के उसे मैं ने लिखा क्या क्या कुछ
“The Qibla and the Kaaba, the God-worshipper and the beloved, the compassionate one, How many things have I written, distressed by him?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
किबला और काबा, ख़ुदा-वंद और मेहरबान, और वह दयालु व्यक्ति, मैं उससे बेचैन होकर क्या-क्या लिख बैठा हूँ।
विस्तार
यह शेर इबादत और रूहानी एहसास का बेहतरीन नज़ारा है। शायर का इशारा काबा, खुदा और इबादत की उस जगह की तरफ है, जो हर इंसान को सुकून देती है। वो कह रहे हैं कि दिल में एक बेचैनी, एक तड़प लिए... उन्होंने इस विषय पर कितने नज़्म और कितने अल्फ़ाज़ लिखे हैं। यह एहसास बताता है कि जब आप किसी पाक चीज़ से मोहब्बत करते हैं, तो आपके अंदर की हर भावना, हर लफ़्ज़ बस उसी के लिए निकलती है।
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