तुझ को क्या बनने बिगड़ने से ज़माने के कि याँ
ख़ाक किन किन की हुई सिर्फ़ बना क्या क्या कुछ
“What good is being or falling from the world’s eyes?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
ज़माने की नज़रों में बनने या बिगड़ने से क्या फ़र्क़ पड़ता है? यह तो सिर्फ़ धूल है कि क्या-क्या बन गया और क्या-क्या बिगड़ गया।
विस्तार
ये शेर हमें ज़माने की नश्वरता का एहसास दिलाता है। शायर कहते हैं कि दुनिया की परवाह क्यों करें? न जाने कितने लोगों की ख़ाक (धूल) है, और आपने सिर्फ़ क्या-क्या बना पाया है? यह शेर हमें सिखाता है कि जीवन की भागदौड़ में हम अक्सर उन चीज़ों को अहमियत दे देते हैं जो असल में कुछ भी नहीं हैं। हमें बाहरी दिखावे से ऊपर उठकर जीना चाहिए।
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