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अक्स उस बे-दीद का तो मुत्तसिल पड़ता था सुब्ह
दिन चढ़े क्या जानूँ आईने की क्या सूरत हुई

The reflection of that unseen face used to be continuous in the morning; what do I know what the mirror's appearance has become as the day advances.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

वह अनदेखे चेहरे का प्रतिबिंब सुबह में लगातार रहता था; दिन के आगे बढ़ने पर मैं नहीं जानता कि आईने का रूप क्या हो गया होगा।

विस्तार

यह शेर यादों और समय के बदलते स्वरूप पर एक गहरा विचार है। शायर कहते हैं कि उस बेपरवाह महबूब का अक्स तो हर सुबह लगातार दिखता था। लेकिन जब दिन चढ़ आया, तो आईने में जो सूरत दिखी, वह बिल्कुल अलग थी। यह दिखाता है कि हमारी यादें, हमारा प्यार, और यहां तक कि हमारी अपनी पहचान भी, समय के साथ कितनी बदल सकती है।

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