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ग़ज़ल

जिंस-ए-गिराँ को तुझ से जो लोग चाहते हैं

जिंस-ए-गिराँ को तुझ से जो लोग चाहते हैं

यह ग़ज़ल उन लोगों के बारे में है जो आपके (प्रिय) से कीमती चीज़ें चाहते हैं, लेकिन वे अपने मन को अशांत रखकर उन्हें प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। वक्ता कहता है कि वह भी उस प्रेम के नशे में है, लेकिन हर पल संघर्ष करता है। अंत में, वक्ता अपनी दोस्ती के मान और अपनी मुश्किल पसंद को व्यक्त करता है, जो प्रशंसा के बावजूद भी आसान नहीं है।

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1
जिंस-ए-गिराँ को तुझ से जो लोग चाहते हैं वे रोग अपने जी को नाहक़ बसाहते हैं
जिंस-ए-गिराँ को तुझ से जो लोग चाहते हैं, वे रोग अपने जी को नाहक़ बसाते हैं। इसका अर्थ है कि जो लोग आप से भारी चाहत रखते हैं, वे स्वयं अपने दिल में अनचाहे रोग (या कष्ट) बसा लेते हैं।
2
उस मय-कदे में हम भी मुद्दत से हैं व-लेकिन ख़म्याज़ा खींचते हैं हर दम जमाहते हैं
उस मदहोशी की हालत में, हालाँकि हम लंबे समय से हैं, फिर भी हम हर पल धागा खींचते और बुनते रहते हैं।
3
नामूस दोस्ती से गर्दन बंधी है अपनी जीते हैं जब तलक हम तब तक निबाहते हैं
नामूस दोस्ती से हमारी गर्दन बंधी है; हम जब तक जीवित रहेंगे, तब तक इस रिश्ते को निभाते रहेंगे।
4
सहल इस क़दर नहीं है मुश्किल-पसंदी मेरी जो तुझ को देखते हैं मुझ को सराहते हैं
मेरी पसंद इतनी आसान नहीं है, और न ही इतनी मुश्किल, जो लोग तुम्हें देखते हैं और मेरी प्रशंसा करते हैं।
5
वे दिन गए कि रातें नालों से काटते थे बे-डोल 'मीर'-साहिब अब कुछ कराहते हैं
वो दिन गए जब रातें नालों से काटी जाती थीं, बे-डोल 'मीर'-साहिब अब कुछ कराहते हैं।
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