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कहाँ आजिज़-सुख़न क़ादिर-सुख़न हूँ हमें है शुबह यारों के सुख़न में

Where am I, capable of such speech, or capable of such verse? It is in the talk of friends that we find doubt's pleasure.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मैं किस तरह का वक्ता हूँ, जो आज़िज़-सुख़न और क़ादिर-सुख़न दोनों हूँ। हमें तो दोस्तों की बातों में ही संदेह का आनंद मिलता है।

विस्तार

यह शेर एक बहुत गहरी उलझन को बयां करता है। शायर पहले खुद से सवाल करते हैं कि मैं बोल नहीं पाता, या मेरे पास बोल तो हैं? लेकिन असली बात तो बाद में आती है... कि उन्हें अपने दोस्तों के लफ़्ज़ों पर शक है! यह दिखाता है कि कभी-कभी इंसान को सबसे ज़्यादा डर अपने करीबी लोगों के भरोसे से लगता है। क्या दोस्त सच बोलते हैं, या सिर्फ़ मीठी बातें करते हैं?

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