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बीमार तू न होवे जिए जब तलक कि 'मीर'
सोने न देगा शोर तिरी आह आह का

Oh, 'Mir', you will not live until you are ill, For the sound of your sighs will not let me sleep.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मीर! जब तक तुम बीमार नहीं हो जाते, तब तक तुम्हारी आहों की आवाज़ मुझे सोने नहीं देगी।

विस्तार

यह शेर इश्क़ की उस पीड़ा को बयां करता है, जहाँ चैन का कोई ठिकाना नहीं होता। शायर कहते हैं कि अगर महबूब बीमार भी न हो... तो भी उसकी एक आह (साँस) हमें सोने नहीं देती। यह शारीरिक बीमारी से कहीं ज़्यादा गहरा एहसास है। यह दिल का वो हाल है, जहाँ महबूब की मौजूदगी ही एक तरह की सज़ा है, एक मीठी तड़प है।

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