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ग़ज़ल

कहाँ तक ग़ैर जासूसी के लेने को लगा आवे

कहाँ तक ग़ैर जासूसी के लेने को लगा आवे

यह ग़ज़ल प्रेम के कष्टों और बेवजह की जासूसी भरी निगाहों से होने वाली बेचैनी को दर्शाती है। कवि कहता है कि इस दुनिया की हर मुसीबत (बला) पर यह परेशानी आ रही है, और प्रेम के रंग में हँसी और आँसू दोनों ही एक साथ आ रहे हैं।

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1
कहाँ तक ग़ैर जासूसी के लेने को लगा आवे इलाही इस बला-ए-ना-गहाँ पर भी बला आवे
ग़ैर जासूसी के लेने को तुम कहाँ तक लगा आए? हे इलाही! इस दुनिया की विपत्ति पर भी विपत्ति आती है।
2
रुका जाता है जी अंदर ही अंदर आज गर्मी से बला से चाक ही हो जावे सीना टुक हवा आवे
गर्मी के कारण मेरा मन बेचैन हो जाता है, जैसे हवा के झोंके से मेरा सीना फट जाएगा।
3
तिरा आना ही अब मरकूज़ है हम को दम-ए-आख़िर ये जी सदक़े किया था फिर न आवे तन में या आवे
तुम्हारा आना ही अब हमारा अंतिम गंतव्य है, यह जीवन व्यर्थ जीया था, और या तो यह शरीर में वापस नहीं आएगा या आएगा।
4
ये रस्म-ए-आमद-ओ-रफ़्त-ए-दयार-ए-इश्क़ ताज़ा है हँसी वो जाए मेरी और रोना यूँ चला आवे
प्रेम के इस स्थान पर आने-जाने का रिवाज अभी नया है; मेरी हँसी चली जाती है और रोना ऐसे ही बहता आता है।
5
असीरी ने चमन से मेरी दिल-गर्मी को धो डाला वगर्ना बर्क़ जा कर आशियाँ मेरा जला आवे
असीरी ने चमन से मेरे दिल की गरमाहट को धो दिया, वरना बिजली चमककर मेरा घोंसला जला देगी।
6
उमीद-ए-रहम उन से सख़्त ना-फ़हमी है आशिक़ की ये बुत संगीं-दिली अपनी न छोड़ें गर ख़ुदा आवे
आशिक़ के लिए रहमत की उम्मीद एक कड़वा भ्रम है, और अगर ईश्वर आएगा, तो मेरा समर्पित हृदय इस मूर्ति को नहीं छोड़ेगा।
7
ये फ़न्न-ए-इश्क़ है आवे उसे तीनत में जिस की हो तू ज़ाहिद-ए-पीर-ए-ना-बालिग़ है बे तह तुझ को क्या आवे
यह इश्क़ का हुनर है जो तीन हिस्सों में आता है, जो किसी के लिए है। तुम तो एक नए साधु की तरह हो, जो आध्यात्मिक रूप से अपरिपक्व है; तुम्हें क्या आ सकता है।
8
हमारे दिल में आने से तकल्लुफ़ ग़म को बेजा है ये दौलत-ख़ाना है उस का वो जब चाहे चला आवे
हमारे दिल में आने से तकल्लुफ़ ग़म को बेजा है। ये दौलत-ख़ाना है उस का वो जब चाहे चला आवे। (अर्थ: हमारे दिल में आने से दुख को सहना आसान हो गया है। वह व्यक्ति एक ऐसे खजाने जैसा है, जिसे वह जब चाहे हमारे पास ले आ सकता है।)
9
ब-रंग‌‌‌‌-ए-बू-ए-ग़ुंचा उम्र इक ही रंग में गुज़रे मयस्सर 'मीर'-साहिब गर दिल बे-मुद्दआ आवे
फूल की ख़ुशबू के रंग में जीवन का एक ही रंग गुज़र जाए; ऐ मीर, अगर दिल बिना किसी इच्छा के आ जाए, तो क्या वह संभव है।
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