बोई कबाब सोख़्ता आई दिमाग़ में
शायद जिगर भी आतिश-ए-ग़म ने जिला दिया
“The kebab's aroma filled my mind, Perhaps my liver was revived by the fire of sorrow.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
दिमाग़ में कबाब की खुशबू फैल गई, और शायद मेरे जिगर को भी ग़म की आग ने ज़िंदा कर दिया।
विस्तार
यह शेर एक बहुत गहरा तफ़र्क़़ (paradox) बयान करता है। शायर कहते हैं कि कभी-कभी किसी साधारण चीज़ की महक भी दिमाग़ में बस जाती है। लेकिन इसका असली मतलब यह है कि ग़म की आग (आतिश-ए-ग़म) इतनी तेज़ होती है कि वह हमें जलाकर, फिर भी हमें ज़िंदा कर देती है। दर्द ही ज़िंदा रहने का एक ज़रिया बन जाता है।
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