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क्या मैं भी परेशानी-ए-ख़ातिर से क़रीं था
आँखें तो कहीं थीं दिल-ए-ग़म-दीदा कहीं था

Was I also accompanied by the distress of concern, My eyes were somewhere, my heart was in sorrow.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

क्या मैं भी चिंता की परेशानी का साथी था और आँखें कहीं और थीं, दिल ग़म से भरा हुआ कहीं और था।

विस्तार

यह शेर एक गहरी भावनात्मक उलझन को बयान करता है। शायर सवाल करते हैं कि क्या वे भी जीवन की परेशानियों के आदी थे। दूसरी लाइन में जो विरोधाभास है, वह बहुत गहरा है—उनकी आँखें एक जगह देखती हैं, लेकिन उनका दिल कहीं और, ग़म के माहौल में रहता है। यह उस दर्द को दर्शाता है जब आप मन से कहीं और होते हुए भी, ज़ाहिर तौर पर मौजूद होते हैं।

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