ग़ज़ल
क्या मैं भी परेशानी-ए-ख़ातिर से क़रीं था
क्या मैं भी परेशानी-ए-ख़ातिर से क़रीं था
यह ग़ज़ल विरह और बिछोह के गहरे दर्द को व्यक्त करती है, जहाँ शायर अपने प्रेम में हुई पीड़ा और परेशानी को याद करता है। वह पूछता है कि क्या वह भी प्रेम के कारण हुई तकलीफों का साक्षी था, और याद करता है कि कैसे प्रियजन की उपस्थिति में भी उसे अलगाव का दर्द महसूस हुआ।
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1
क्या मैं भी परेशानी-ए-ख़ातिर से क़रीं था
आँखें तो कहीं थीं दिल-ए-ग़म-दीदा कहीं था
क्या मैं भी चिंता की परेशानी का साथी था और आँखें कहीं और थीं, दिल ग़म से भरा हुआ कहीं और था।
2
किस रात नज़र की है सू-ए-चश्मक-ए-अंजुम
आँखों के तले अपने तो वो माह-जबीं था
किस रात ने तारों की आँखों की ओर अपनी नज़र घुमाई? क्योंकि अपनी आँखों के नीचे तो तुम चाँद की तरह चमकते थे।
3
आया तो सही वो कोई दम के लिए लेकिन
होंटों पे मिरे जब नफ़स-ए-बाज़-पुसीं था
वह तो आया, ज़रूर किसी पल के मनमुटाव के लिए, लेकिन जब मेरे होंठों पर साँसों का जादू था।
4
अब कोफ़्त से हिज्राँ की जहाँ तन पे रखा हाथ
जो दर्द-ओ-अलम था सो कहे तू कि वहीं था
अब कोफ़्त से हिज्राँ की जहाँ तन पे रखा हाथ, जो दर्द-ओ-अलम था सो कहे तू कि वहीं था। शायर कह रहा है कि प्रिय की गाल के पास, जहाँ तुमने हाथ रखा था, वही वह सारा दर्द और पीड़ा थी।
5
जाना नहीं कुछ जुज़ ग़ज़ल आ कर के जहाँ में
कल मेरे तसर्रुफ़ में यही क़ित'आ ज़मीं था
जहाँ में कुछ भी ग़ज़ल से ज़्यादा क़ीमती नहीं है, क्योंकि कल यह पूरी ज़मीन मेरे वश-में थी।
6
नाम आज कोई याँ नहीं लेता है उन्हों का
जिन लोगों के कल मुल्क ये सब ज़ेर-ए-नगीं था
आज कोई उन लोगों का नाम नहीं लेता जिनके कल ये पूरा देश उनके अधीन था।
7
मस्जिद में इमाम आज हुआ आ के वहाँ से
कल तक तो यही 'मीर' ख़राबात-नशीं था
मस्जिद में इमाम आज आया, वहाँ से। कल तक तो यही 'मीर' ख़राबात-नशीं था।
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