तेरा शिकवा मुझे न मेरा तुझे
चाहिए यूँ जो फ़िल-हक़ीक़त है
“I do not want your complaint, nor do I want mine; / This is the truth that is beyond mere illusion.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
आपका कोई शिकवा मुझे नहीं चाहिए, और न ही मुझे आपका चाहिए; यह वह सत्य है जो केवल कल्पना से परे है।
विस्तार
यह शेर दिल की बहुत गहरी बात कहता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि शिकायतें... न अपनी और न ही किसी और से। असली सुकून तो बस उस हक़ीक़त में है, जो है। यह एहसास है कि जब हम शिकायत करना छोड़ देते हैं, जब हम सच को स्वीकार कर लेते हैं, तभी मन को शांति मिलती है। यह एक तरह का आत्म-समर्पण है।
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