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ग़ज़ल

अनुभूति

انبھوتی
सुरेश दलाल· Ghazal· 4 shers

यह ग़ज़ल प्रकृति की सूक्ष्म क्रियाओं का एक शांत चित्र प्रस्तुत करती है। इसमें एक सूर्यकिरण के छिपी हुई शैवाल से मिलने के लिए जल में कोमल अवतरण का सुंदर वर्णन है, जिससे जल काँप उठता है और विभिन्न ध्वनियाँ शांत हो जाती हैं। कविता विशाल आकाश के धीरे से उतरने और गीली घास की उँगलियों पर लाखों हीरों की तरह चमकती ओस की बूँदों के बिंब के साथ समाप्त होती है, जो एक शांत आश्चर्य और छिपी हुई सुंदरता की भावना को जगाती है।

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1
લીલ લપાઈ બેઠી જળને તળિયે; સૂર્યકિરણને એમ થયું કે લાવ જઈને મળિયે!
शैवाल पानी के तल में छिपा हुआ था। एक सूर्य किरण ने सोचा कि लाओ, उससे जाकर मिलूँ।
2
કંપ્યું જળનું રેશમ પોત; કિરણ તો ઝૂક્યું થઈ કપોત.
जल का रेशमी पोत काँप उठा; किरण तो कबूतर बनकर झुक गई।
3
વિધવિધ સ્વરની રમણા જંપી નીરવની વાંસળીએ! હળવે ઊતરે આખું વ્યોમ;
विविध स्वरों का खेल शांत बाँसुरी पर थम गया है। पूरा आकाश धीरे से उतरता है।
4
નેણને અણજાણી આ ભોમ. લખ લખ હીરા ઝળકે ભીનાં તૃણ તણી આંગળીએ!
आँखों के लिए यह भूमि अनजानी है। भीगी हुई घास की उंगलियों पर लाखों-लाखों हीरे चमकते हैं!
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