न रूह-ए-मज़हब न क़ल्ब-ए-आरिफ़ न शाइ'राना ज़बान बाक़ी ज़मीं हमारी बदल गई है अगरचे है आसमान बाक़ी

“Neither the spirit of faith, nor the mystic's heart, nor the poetic tongue remains; our earth has altered beneath our feet, though the sky unchanged sustains.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

न अब धर्म की वास्तविक आत्मा बची है, न किसी ज्ञानी का हृदय और न ही काव्यात्मक भाषा; यद्यपि आकाश वही है, लेकिन हमारी ज़मीन पूरी तरह बदल चुकी है।

विस्तार

शायर इस शेर में तहज़ीब और रूहानियत के मिटते हुए रंगों पर गहरा अफ़सोस ज़ाहिर करता है। ऊपर का आसमान भले ही पहले जैसा दिखता हो, लेकिन हमारी ज़मीन यानी हमारी इंसानी दुनिया, उसका मिज़ाज और उसकी कद्रें पूरी तरह बदल चुकी हैं। न अब धर्म की सच्ची रूह बाकी है, न सूफ़ियों जैसा हमदर्द दिल और न ही वह मीठी शाइराना ज़बान; बाहर सब कुछ वैसा ही लगता है मगर अंदर से एक पूरा दौर ख़त्म हो चुका है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.