ग़ज़ल

न रूह-ए-मज़हब न क़ल्ब-ए-आरिफ़ न शाइ'राना ज़बान बाक़ी

نہ روح مذہب نہ قلب عارف نہ شاعرانہ زبان باقی
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 7 shers· radif: बाक़ी

यह ग़ज़ल आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक पतन पर गहरा शोक व्यक्त करती है, जहाँ धर्म की मूल आत्मा और शायरी की नफ़ासत अब खो चुकी है। गुज़रे हुए दौर की भव्यता मिट जाने के बाद, कवि बदलते हुए संसार में केवल हसरत और उदासी के शेष रह जाने का मर्मस्पर्शी चित्रण करता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
न रूह-ए-मज़हब न क़ल्ब-ए-आरिफ़ न शाइ'राना ज़बान बाक़ी ज़मीं हमारी बदल गई है अगरचे है आसमान बाक़ी
न अब धर्म की वास्तविक आत्मा बची है, न किसी ज्ञानी का हृदय और न ही काव्यात्मक भाषा; यद्यपि आकाश वही है, लेकिन हमारी ज़मीन पूरी तरह बदल चुकी है।
2
शब-ए-गुज़िश्ता के साज़ ओ सामाँ के अब कहाँ हैं निशान बाक़ी ज़बान-ए-शमा-ए-सहर पे हसरत की रह गई दास्तान बाक़ी
बीती रात की महफ़िल और उसके साज़-ओ-सामान का अब कोई निशान बाकी नहीं रहा। सुबह बुझती हुई शमा की ज़बान पर बस हसरत की एक दास्तान बची रह गई है।
3
जो ज़िक्र आता है आख़िरत का तो आप होते हैं साफ़ मुनकिर ख़ुदा की निस्बत भी देखता हूँ यक़ीन रुख़्सत गुमान बाक़ी
जब भी आख़िरत या परलोक का ज़िक्र होता है तो आप साफ़ इनकार कर देते हैं, और ईश्वर के बारे में भी मुझे लगता है कि आपका यक़ीन ख़त्म हो चुका है और सिर्फ़ शक बचा है।
4
फ़ुज़ूल है उन की बद-दिमाग़ी कहाँ है फ़रियाद अब लबों पर ये वार पर वार अब अबस हैं कहाँ बदन में है जान बाक़ी
उनका घमंड और बदमिज़ाजी अब बेकार है क्योंकि मेरे होंठों पर कोई फ़रियाद बाकी नहीं है। मुझ पर बार-बार वार करना भी व्यर्थ है, क्योंकि अब शरीर में जान ही कहाँ बची है।
5
मैं अपने मिटने के ग़म में नालाँ उधर ज़माना है शाद ओ ख़ंदाँ इशारा करती है चश्म-ए-दौराँ जो आन बाक़ी जहान बाक़ी
मैं अपने बर्बाद होने के दुख में रो रहा हूँ जबकि दुनिया खुश और हँस रही है, मगर समय की नज़र इशारा करती है कि जब तक आत्मसम्मान और आन बाकी है, तब तक सारा संसार बाकी है।
6
इसी लिए रह गई हैं आँखें कि मेरे मिटने का रंग देखें सुनूँ वो बातें जो होश उड़ाएँ इसी लिए हैं ये कान बाक़ी
ये आँखें सिर्फ़ इसलिए बची रह गई हैं ताकि मेरे बर्बाद होने का तमाशा देख सकें, और ये कान सिर्फ़ इसलिए बाक़ी हैं ताकि मैं होश उड़ा देने वाली बातें सुन सकूँ।
7
तअ'ज्जुब आता है तिफ़्ल-ए-दिल पर कि हो गया मस्त-ए-नज़्म-ए-'अकबर' अभी मिडिल पास तक नहीं है बहुत से हैं इम्तिहान बाक़ी
मुझे अपने नादान दिल पर अचरज होता है कि वह अभी से 'अकबर' की शायरी में मस्त हो गया है। अभी तो इसने मिडिल स्कूल भी पास नहीं किया है और आगे कई इम्तिहान बाकी हैं।
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