“Their haughty scorn is pointless now, no plea remains upon my lips; strike after strike is all in vain—what life is left within this frame?”
उनका घमंड और बदमिज़ाजी अब बेकार है क्योंकि मेरे होंठों पर कोई फ़रियाद बाकी नहीं है। मुझ पर बार-बार वार करना भी व्यर्थ है, क्योंकि अब शरीर में जान ही कहाँ बची है।
यह शेर दिल टूटने के उस मक़ाम को बयां करता है जहाँ ज़ुल्म सहने की भी ताक़त ख़त्म हो जाती है। शायर महबूब से कहता है कि अब उनका ग़ुरूर और लगातार वार करना बेअसर है, क्योंकि न तो लबों पर कोई शिकायत बची है और न ही इस जिस्म में सहने के लिए जान। यह उस ख़ामोश बेहिसी की तस्वीर है, जहाँ इंसान दर्द की उस हद से गुज़र जाता है कि उसे चोट का अहसास होना ही बंद हो जाता है।
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