“Whenever the hereafter is mentioned, you flatly deny it; regarding God too, I see certainty has departed and only doubt remains.”
जब भी आख़िरत या परलोक का ज़िक्र होता है तो आप साफ़ इनकार कर देते हैं, और ईश्वर के बारे में भी मुझे लगता है कि आपका यक़ीन ख़त्म हो चुका है और सिर्फ़ शक बचा है।
इस शेर में शायर अपने किसी अज़ीज़ की डगमगाती हुई आस्था पर बड़े अपनेपन और नज़ाकत से बात करता है। परलोक या आख़िरत की बात आते ही वे सिरे से मुकर जाते हैं, और ख़ुदा के तईं भी उनका पक्का यक़ीन अब विदा हो चुका है—बस एक धुंधला सा वहम या शक़ ही बाकी रह गया है। यह शेर इंसान के उस अंदरूनी भटकाव को बड़ी सादगी से बयान करता है, जहाँ गहरे विश्वास की जगह सिर्फ़ अनिश्चितता की ख़ामोशी ले लेती है।
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