शब-ए-गुज़िश्ता के साज़ ओ सामाँ के अब कहाँ हैं निशान बाक़ी ज़बान-ए-शमा-ए-सहर पे हसरत की रह गई दास्तान बाक़ी

“Where now remain the traces of last night's festive splendor? / Upon the tongue of the morning candle lingers only a tale of longing.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

बीती रात की महफ़िल और उसके साज़-ओ-सामान का अब कोई निशान बाकी नहीं रहा। सुबह बुझती हुई शमा की ज़बान पर बस हसरत की एक दास्तान बची रह गई है।

विस्तार

यह शेर रात की महफ़िल की रौनक और सुबह की तन्हाई के दर्द को बड़ी ख़ूबसूरती से बयां करता है। रात भर जो जश्न, महफ़िल और रंगीनियाँ थीं, पौ फटते ही उनका नामोनिशान मिट चुका है। बुझती हुई सुबह की शमा की कांपती लौ मानो उसकी ज़बान बन गई है, जिस पर रात के बीत जाने और बिछड़ने का अफ़सोस एक दास्तान की तरह दर्ज़ है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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