“The Sheikh perhaps may live in fear of God; as for me, I dread the English alone.”
हो सकता है कि शैख़ साहब ईश्वर से डरते हों, लेकिन मैं तो सिर्फ़ अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ।
अकबर इलाहाबादी का यह शेर व्यंग्य और बेबाक सच्चाई की अनोखी मिसाल है। जहाँ धर्मगुरु यानी शैख़ साहब परलोक और ईश्वर के ख़ौफ़ की बातें करते हैं, वहीं शायर अपनी ज़मीनी हक़ीक़त बयां करते हुए कहता है कि उसे तो हुकूमत कर रहे अंग्रेजों का डर ज़्यादा सताता है। यह शेर हँसी-मज़ाक के लहज़े में उस दौर की ग़ुलामी और आम इंसान की बेबसी का कड़वा सच सामने रख देता है।
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