“For lessons in wisdom, O Akbar, the book of the heart is enough for me; I have no need of Spencer, and with Mill I could never agree.”
अकबर कहते हैं कि हिकमत और बुद्धिमत्ता का पाठ सीखने के लिए मेरे दिल की किताब ही काफ़ी है; मुझे स्पेंसर की कोई ज़रूरत नहीं है और जॉन स्टुअर्ट मिल से मेरी सोच मेल नहीं खाती।
अकबर इलाहाबादी इस शेर में पश्चिमी दर्शन की शुष्क तार्किकता के मुक़ाबले रूहानी और दिली सूझबूझ को तरजीह देते हैं। वे हरबर्ट स्पेंसर और जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे विचारकों से बेपरवाह हैं, और 'मिल' के नाम पर ख़ूबसूरत लफ़्ज़ी खेल रचते हुए कहते हैं कि उनकी तबीयत इस फ़लसफ़े से मेल ही नहीं खाती। उनका मानना है कि ज़िंदगी और हिकमत की सच्ची समझ किसी भारी-भरकम किताब में नहीं, बल्कि अपने ही दिल के पन्नों को पढ़ने से मिलती है।
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