“All senses and mind are lost in the ocean of divine insight; this is the boundless sea where no wave ever finds a shore.”
ईश्वर की पहचान और ज्ञान के सागर में सारे होश-ओ-हवास खो जाते हैं। यह ऐसा दरिया है जिसमें उठने वाली लहर को कभी किनारा नसीب नहीं होता।
शायर यहाँ ईश्वर की रूहानी पहचान को एक ऐसे असीम समंदर के रूप में पेश कर रहे हैं, जहाँ पहुँचकर इंसान की सारी अक़्ल और होश-ओ-हवास हैरान होकर गुम हो जाते हैं। 'मौज' यानी लहर उस साधक का प्रतीक है जो किनारे की तलाश में भटकती है, मगर उसे समझ आता है कि परमात्मा की हक़ीक़त की कोई हद या किनारा है ही नहीं। इस दरिया में ख़ुद को खो देना कोई नाकामी नहीं, बल्कि उस अनंत रहस्य में पूरी तरह लीन हो जाने का सबसे ख़ूबसूरत मक़ाम है।
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