हवास-ओ-होश गुम हैं बहर-ए-इरफ़ान-ए-इलाही में यही दरिया है जिस में मौज को साहिल नहीं मिलता

“All senses and mind are lost in the ocean of divine insight; this is the boundless sea where no wave ever finds a shore.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

ईश्वर की पहचान और ज्ञान के सागर में सारे होश-ओ-हवास खो जाते हैं। यह ऐसा दरिया है जिसमें उठने वाली लहर को कभी किनारा नसीب नहीं होता।

विस्तार

शायर यहाँ ईश्वर की रूहानी पहचान को एक ऐसे असीम समंदर के रूप में पेश कर रहे हैं, जहाँ पहुँचकर इंसान की सारी अक़्ल और होश-ओ-हवास हैरान होकर गुम हो जाते हैं। 'मौज' यानी लहर उस साधक का प्रतीक है जो किनारे की तलाश में भटकती है, मगर उसे समझ आता है कि परमात्मा की हक़ीक़त की कोई हद या किनारा है ही नहीं। इस दरिया में ख़ुद को खो देना कोई नाकामी नहीं, बल्कि उस अनंत रहस्य में पूरी तरह लीन हो जाने का सबसे ख़ूबसूरत मक़ाम है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.