ग़ज़ल
तरीक़-ए-इश्क़ में मुझ को कोई कामिल नहीं मिलता
طریق عشق میں مجھ کو کوئی کامل نہیں ملتا
यह ग़ज़ल सच्चे प्रेम और निष्ठा की कमी पर गहरा अफ़सोस व्यक्त करती है, जहाँ फ़रहाद और मजनूँ जैसे सच्चे आशिक़ अब नहीं मिलते। भरी महफ़िल में भी अकेलापन महसूस करते हुए शायर आत्म-मंथन करता है कि यह भावनात्मक दूरी उसकी अपनी किसी कमी का परिणाम है या ज़माने में ही कोई सच्चा प्रेमी शेष नहीं बचा।
Source: rekhta · HI
वीडियो · क्लासिक
वीडियो देखें →गीत सुनें
1
तरीक़-ए-इश्क़ में मुझ को कोई कामिल नहीं मिलता
गए फ़रहाद ओ मजनूँ अब किसी से दिल नहीं मिलता
इश्क़ के रास्ते में मुझे कोई भी परिपूर्ण प्रेमी नहीं मिलता; फ़रहाद और मजनूँ के चले जाने के बाद अब मेरा दिल किसी से मेल नहीं खाता।
2
भरी है अंजुमन लेकिन किसी से दिल नहीं मिलता
हमीं में आ गया कुछ नक़्स या कामिल नहीं मिलता
महफ़िल लोगों से भरी हुई है मगर किसी से दिल नहीं मिलता। या तो हम में ही कोई कमी आ गई है, या फिर कोई मुकम्मल इंसान ही नहीं मिलता।
3
पुरानी रौशनी में और नई में फ़र्क़ इतना है
उसे कश्ती नहीं मिलती इसे साहिल नहीं मिलता
पुरानी रोशनी और नई रोशनी में बस इतना फ़र्क़ है कि पहले वाले को नाव नहीं मिलती और दूसरे वाले को किनारा नहीं मिलता।
4
पहुँचना दाद को मज़लूम का मुश्किल ही होता है
कभी क़ाज़ी नहीं मिलते कभी क़ातिल नहीं मिलता
किसी सताए हुए इंसान के लिए इंसाफ़ हासिल करना हमेशा बहुत कठिन होता है, क्योंकि कभी फ़ैसला करने वाला क़ाज़ी नहीं मिलता तो कभी क़ातिल ही ग़ायब रहता है।
5
हरीफ़ों पर ख़ज़ाने हैं खुले याँ हिज्र-ए-गेसू है
वहाँ पे बिल है और याँ साँप का भी बिल नहीं मिलता
विरोधियों के लिए ख़ज़ाने खुले हैं और यहाँ मुझे महबूब की ज़ुल्फ़ों की जुदाई मिली है; वहाँ ज़ुल्फ़ों के बल मौजूद हैं और यहाँ मुझे छुपने के लिए साँप का बिल भी नसीब नहीं होता।
6
ये हुस्न ओ इश्क़ ही का काम है शुबह करें किस पर
मिज़ाज उन का नहीं मिलता हमारा दिल नहीं मिलता
यह सब हुस्न और इश्क़ का ही काम है, फिर किसी और पर क्या शक किया जाए। न उनका मिज़ाज मिलता है और न ही हमारा दिल उनसे मेल खाता है।
7
छुपा है सीना ओ रुख़ दिल-सिताँ हाथों से करवट में
मुझे सोते में भी वो हुस्न से ग़ाफ़िल नहीं मिलता
करवट में उसके हाथों ने उसके सीने और दिलकश चेहरे को छिपा रखा है; मुझे वह नींद में भी अपने हुस्न की हिफ़ाज़त से बेपरवाह नहीं मिलती।
8
हवास-ओ-होश गुम हैं बहर-ए-इरफ़ान-ए-इलाही में
यही दरिया है जिस में मौज को साहिल नहीं मिलता
ईश्वर की पहचान और ज्ञान के सागर में सारे होश-ओ-हवास खो जाते हैं। यह ऐसा दरिया है जिसमें उठने वाली लहर को कभी किनारा नसीب नहीं होता।
9
किताब-ए-दिल मुझे काफ़ी है 'अकबर' दर्स-ए-हिकमत को
मैं स्पेन्सर से मुस्तग़नी हूँ मुझ से मिल नहीं मिलता
अकबर कहते हैं कि हिकमत और बुद्धिमत्ता का पाठ सीखने के लिए मेरे दिल की किताब ही काफ़ी है; मुझे स्पेंसर की कोई ज़रूरत नहीं है और जॉन स्टुअर्ट मिल से मेरी सोच मेल नहीं खाती।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
