“For the oppressed to ever gain redress remains an ordeal severe: sometimes the judge is nowhere found, sometimes the slayer does not appear.”
किसी सताए हुए इंसान के लिए इंसाफ़ हासिल करना हमेशा बहुत कठिन होता है, क्योंकि कभी फ़ैसला करने वाला क़ाज़ी नहीं मिलता तो कभी क़ातिल ही ग़ायब रहता है।
यह शेर इंसाफ़ की तलाश में भटकते कमज़ोर इंसान की बेबसी को बेहद सादगी से बयां करता है। शायर कहते हैं कि पीड़ित को इंसाफ़ मिलना हमेशा नामुमकिन-सा लगता है, क्योंकि जब फ़ैसला सुनाने वाला क़ाज़ी मौजूद हो तो मुजरिम ग़ायब रहता है, और जब मुजरिम सामने हो तो कोई इंसाफ़ करने वाला नहीं होता। इश्क के नज़रिए से देखें तो यह दिल टूटे आशिक़ का दर्द भी है, जिसे न तो महबूब की तवज्जो मिलती है और न ही ज़माने से कोई हमदर्दी।
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