पुरानी रौशनी में और नई में फ़र्क़ इतना है उसे कश्ती नहीं मिलती इसे साहिल नहीं मिलता

“Between the old light and the new, the difference is merely this: / That one can find no boat, and this one finds no shore.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

पुरानी रोशनी और नई रोशनी में बस इतना फ़र्क़ है कि पहले वाले को नाव नहीं मिलती और दूसरे वाले को किनारा नहीं मिलता।

विस्तार

शायर ने यहाँ पुरानी और नई सोच के फ़र्क़ को समंदर, कश्ती और साहिल के बेहद खूबसूरत रूपक से समझाया है। 'पुरानी रौशनी' यानी गुज़रे दौर के पास ज़िंदगी के मायने और मंज़िल तो साफ़ थे, मगर आगे बढ़ने के लिए साधन या कश्ती मौजूद न थी। वहीं 'नई रौशनी' यानी हमारे आज के आधुनिक दौर के पास तरक़्क़ी की हर कश्ती मौजूद है, मगर भटकाव इतना है कि उसे कोई किनारा, स्थिरता या दिली सुकून ही नहीं मिल पा रहा।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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