“The assembly is crowded, yet my heart connects with none; has some flaw crept into me, or is there no perfect one?”
महफ़िल लोगों से भरी हुई है मगर किसी से दिल नहीं मिलता। या तो हम में ही कोई कमी आ गई है, या फिर कोई मुकम्मल इंसान ही नहीं मिलता।
यह शेर भरी महफ़िल के बीच महसूस होने वाले उस अकेलेपन को बयां करता है, जिससे हम सब कभी न कभी गुज़रते हैं। शायर चारों तरफ लोगों की भीड़ तो देखता है, मगर उसका दिल किसी से नहीं जुड़ पाता; वह खुद से ही सवाल करता है कि क्या यह उसकी अपनी कोई कमी है या फिर दुनिया में ही कोई सच्चा और मुकम्मल इंसान नहीं बचा। यह आत्म-मंथन और रूहानी तलाश का एक बेहद खूबसूरत और दर्दभरा इज़हार है।
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