दिल को मस्जिद से न मंदिर से है उन्स ऐसे वहशी को कहीं बहलाएँ क्या

“The heart has no fondness for the mosque, nor love for the temple; how then can one ever divert a spirit so wild and untamed?”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

दिल को न तो मस्जिद से कोई लगाव है और न ही मंदिर से, ऐसे बेक़रार और मतवाले दिल का भला कहीं बहलाव कैसे हो सकता है?

विस्तार

शायर यहाँ दिल को एक बेपरवाह और आज़ाद परिंदे के रूप में देख रहे हैं, जो समाज और मज़हब के तय किए हुए दायरों में क़ैद नहीं होना चाहता। जब इस तड़पते दिल को न मस्जिद के सुकून में चैन मिलता है और न मंदिर की पनाह में, तो भला इसे किसी और दुनियावी चीज़ से कैसे बहलाया जाए? यह शे’र उस रूहानी और इश्क़िया आवारगी को बयां करता है, जहाँ दिल हर ज़ाहिरी सहारे से बेपरवाह होकर सिर्फ़ अपनी ही बेक़रारी में जीता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.