ग़ज़ल
સ્વધામ તરફ
स्वधाम की ओर
यह ग़ज़ल 'स्वधाम की ओर' की यात्रा का वर्णन करती है, जहाँ कवि आत्मा के परम गंतव्य की खोज करता है। यह भौतिक संसार की नश्वरता और आध्यात्मिक मुक्ति के महत्व पर प्रकाश डालती है। यह हमें जीवन के अंतिम उद्देश्य की ओर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करती है।
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1
નશાના ધામ તરફ મસ્તીના મુકામ તરફ,
નિગાહ છે કે રહે છે સદાય જામ તરફ.
नशा के धाम की ओर, मस्ती के मुकाम की ओर, निगाह है कि रहती है सदा जाम की ओर।
नज़र हमेशा जाम की ओर लगी रहती है, जो उसे नशे के धाम और मस्ती के मुकाम की तरफ़ ले जाती है।
2
કરી જો બંદગી સાહેબની અદબથી કરી,
વળ્યા ન હાથ અમારા કદી સલામ તરફ.
करी जो बंदगी साहिब की अदब से की,मुड़े न हाथ हमारे कभी सलाम की तरफ।
अगर हमने मालिक (ईश्वर) की बंदगी अदब से की, तो हमारे हाथ कभी दूसरों को सलाम करने की ओर नहीं मुड़े।
3
ઉઠાવો કોઈ જનાજો જવાન પ્યાસ તણો!
કે મીટ માંડી નથી જાતી ભગ્ન જામ તરફ.
उठाओ कोई जनाज़ा जवान प्यास का! कि मीत माँडी नहीं जाती भग्न जाम की तरफ़।
इस युवा प्यास का जनाज़ा उठाओ, क्योंकि अब टूटे हुए प्याले की ओर देखा भी नहीं जा सकता।
4
હવે તો દ્રષ્ટિ ફક્ત સાદગીને શોધે છે,
ગયો એ દોર કે રહેતી હતી દમામ તરફ.
अब तो दृष्टि केवल सादगी को खोजती है, गया वह दौर जब रहती थी दमाम तरफ।
अब मेरी दृष्टि केवल सादगी को खोजती है, वह दौर चला गया जब यह भव्यता की ओर आकर्षित होती थी।
5
એ સ્નેહનું જ રૂપાંતર છે એય પણ ક્યાંથી!
કે એમને હો તિરસ્કાર મારા નામ તરફ.
वह स्नेह का ही रूपांतरण है, यह भी कहाँ से! कि उन्हें हो तिरस्कार मेरे नाम की तरफ।
कवि इस बात पर आश्चर्य और अविश्वास व्यक्त करता है कि उनके नाम के प्रति जो तिरस्कार है, क्या वह प्रेम का ही एक बदला हुआ रूप है? यह स्वीकार करना कठिन है कि प्रेम इतनी तीव्र घृणा में कैसे बदल सकता है।
6
દીવાનગીમાં અજાયબ મળી ગઈ દ્રષ્ટિ,
કે ફાટી આંખથી જોતા રહ્યા તમામ તરફ.
दीवानगी में अजब दृष्टि प्राप्त हुई,कि फटी आँखों से देखते रहे हर तरफ़।
दीवानगी में एक अद्भुत दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे खुली आँखों से सभी दिशाओं में देखा जा सका।
7
ગતિ ભણી જ નજર નોંધતા રહ્યા કાયમ,
કદી ગયા ન અમે ભૂલથી વિરામ તરફ.
गति की ओर ही नज़रें टिकाए रहे हम कायम, कभी गए ही नहीं भूल से भी विराम की तरफ़।
हमारी नज़रें हमेशा गति और प्रगति पर ही केंद्रित रहीं, और हम भूलकर भी कभी विश्राम की ओर नहीं मुड़े।
8
જો હોય શ્રદ્ધા મુસાફરને પૂર્ણ મંજિલમાં,
તો આપમેળે વળે છે કદમ મુકામ તરફ.
जो हो श्रद्धा मुसाफ़िर को पूर्ण मंज़िल में, तो आप ही मुड़ते हैं क़दम मकाम की तरफ़।
यदि यात्री को अपनी मंज़िल पर पूर्ण विश्वास हो, तो उसके कदम अपने आप ही ठिकाने की ओर मुड़ जाते हैं।
9
હતો એ મસ્ત પ્રવાસી કરી પ્રવાસ સફળ,
અનોખી શાનથી ‘ઘાયલ' ગયો સ્વધામ તરફ.
था वो मस्त मुसाफ़िर, किया प्रवास सफल,अनोखी शान से 'घायल' गया स्वधाम तरफ।
वह एक मस्त यात्री था जिसने अपनी यात्रा सफल बनाई। अनोखी शान के साथ, 'घायल' अपने धाम की ओर चला गया।
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