Sukhan AI
ग़ज़ल

સ્વધામ તરફ

स्वधाम की ओर
अमृत घायल· Ghazal· 9 shers

यह ग़ज़ल 'स्वधाम की ओर' की यात्रा का वर्णन करती है, जहाँ कवि आत्मा के परम गंतव्य की खोज करता है। यह भौतिक संसार की नश्वरता और आध्यात्मिक मुक्ति के महत्व पर प्रकाश डालती है। यह हमें जीवन के अंतिम उद्देश्य की ओर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करती है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
2
કરી જો બંદગી સાહેબની અદબથી કરી, વળ્યા ન હાથ અમારા કદી સલામ તરફ.
करी जो बंदगी साहिब की अदब से की,मुड़े न हाथ हमारे कभी सलाम की तरफ।
अगर हमने मालिक (ईश्वर) की बंदगी अदब से की, तो हमारे हाथ कभी दूसरों को सलाम करने की ओर नहीं मुड़े।
5
એ સ્નેહનું જ રૂપાંતર છે એય પણ ક્યાંથી! કે એમને હો તિરસ્કાર મારા નામ તરફ.
वह स्नेह का ही रूपांतरण है, यह भी कहाँ से! कि उन्हें हो तिरस्कार मेरे नाम की तरफ।
कवि इस बात पर आश्चर्य और अविश्वास व्यक्त करता है कि उनके नाम के प्रति जो तिरस्कार है, क्या वह प्रेम का ही एक बदला हुआ रूप है? यह स्वीकार करना कठिन है कि प्रेम इतनी तीव्र घृणा में कैसे बदल सकता है।
7
ગતિ ભણી જ નજર નોંધતા રહ્યા કાયમ, કદી ગયા ન અમે ભૂલથી વિરામ તરફ.
गति की ओर ही नज़रें टिकाए रहे हम कायम, कभी गए ही नहीं भूल से भी विराम की तरफ़।
हमारी नज़रें हमेशा गति और प्रगति पर ही केंद्रित रहीं, और हम भूलकर भी कभी विश्राम की ओर नहीं मुड़े।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.