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ग़ज़ल

વાણીના સ્વાંગમાં

بیاں کے سنگ میں
अमृत घायल· Ghazal· 7 shers

यह ग़ज़ल वक्ता की आंतरिक भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करती है, जिसमें वह जीवन की नश्वरता और सत्य की खोज का भाव दर्शाते हैं। इसमें प्रेम और विरह के माध्यम से आत्म-खोज का एक गहन साहित्यिक स्पर्श मिलता है।

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આપણને આદિકાળથી અકળાવતું હતું, લાવ્યો છું એ જ મૌન હું વાણીના સ્વાંગમાં!
जो हमें आदिकाल से उलझाता रहा, वही मौन लाया हूँ मैं वाणी के स्वांग में!
कवि कहता है कि जो बात हमें आदिकाल से उलझा रही थी या समझ नहीं आ रही थी, उसी गूढ़ मौन को मैं अब शब्दों के रूप में व्यक्त कर रहा हूँ।
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પૂનમ ગણી હું જેમની પાસે ગયો હતો, એ તો હતી ઉદાસી ઉજાણીના સ્વાંગમાં!
पूनम समझकर मैं जिनके पास गया था,वो तो उदासी थी उजियारी के वेश में!
मैं उनके पास पूर्णिमा की रात समझकर गया था, परंतु वह तो उत्सव के प्रकाश के वेश में छिपी उदासी थी।
7
‘ઘાયલ’, અમારે શુદ્ધ કવિતાઓ જોઈએ, દાસીના સ્વાંગમાં હો કે રાણીના સ્વાંગમાં.
‘घायल’, हमें शुद्ध कविताएँ चाहिए,दासी के स्वांग में हों या रानी के स्वांग में।
कवि 'घायल' कहते हैं कि उन्हें केवल शुद्ध कविताएँ चाहिएं, फिर चाहे वे एक दासी के रूप में हों या एक रानी के वेश में।
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