मिन्नत थी बोसा-ए-लब-ए-शीरीं कि दिल मिरा मुझ को सू-ए-मज़ार-ए-शकर गंज ले चला

“Yearning for a kiss from lips so sweet, my heart carried me off toward the shrine of Shakar Ganj.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

मीठे होंठों के चुंबन की चाहत में मेरा दिल मुझे हज़रत शकर गंज की मज़ार की तरफ़ ले गया।

विस्तार

यह शेर सांसारिक इश्क़ और रूहानी अक़ीदत का एक बेहद हसीन और दिलचस्प संगम है। आशिक़ अपने महबूब के मीठे लबों के बोसे की तमन्ना कर रहा था, लेकिन मिठास की इसी तलब में उसका दिल उसे मशहूर सूफ़ी संत हज़रत बाबा फ़रीद 'शकर गंज' (शक्कर का ख़ज़ाना) की मज़ार पर ले गया। शायर ने यहाँ लफ़्ज़ों की जादूगरी से बड़ी ख़ूबसूरती से दिखाया है कि कैसे हुस्न की चाहत कभी-कभी इंसान को सीधे रूहानियत की चौखट पर पहुँचा देती है।

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