ग़ज़ल
क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चला
قاروں اٹھا کے سر پہ سنا گنج لے چلا
यह ग़ज़ल दुनिया की नश्वरता और सांसारिक धन-दौलत की व्यर्थता पर विचार करती है, जहाँ क़ारूँ जैसे धनवान का हवाला देकर कंजूसों के हाथ केवल दुःख आने की बात कही गई है। कवि भौतिक लालच के खोखलेपन को रेखांकित करते हुए प्रेम, विरह और आध्यात्मिक समर्पण की महत्ता को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चला
दुनिया से क्या बख़ील ब-जुज़ रंज ले चला
क्या किसी ने सुना है कि क़ारूँ सिर पर अपना ख़ज़ाना उठा कर ले गया? आख़िर एक कंजूस इस दुनिया से दुःख और अफ़सोस के सिवा क्या लेकर गया।
2
मिन्नत थी बोसा-ए-लब-ए-शीरीं कि दिल मिरा
मुझ को सू-ए-मज़ार-ए-शकर गंज ले चला
मीठे होंठों के चुंबन की चाहत में मेरा दिल मुझे हज़रत शकर गंज की मज़ार की तरफ़ ले गया।
3
साक़ी सँभालता है तो जल्दी मुझे संभाल
वर्ना उड़ा के पाँ नशा-ए-बंज ले चला
हे साक़ी, अगर तू मुझे संभालना चाहता है तो जल्द संभाल ले, वरना भांग का नशा मेरे पाँव उखाड़कर मुझे उड़ाए लिए जा रहा है।
4
दौड़ा के हाथ छाती पे हम उन की यूँ फिरे
जैसे कोई चोर आ के हो नारंज ले चला
हमने तेज़ी से उनके सीने पर हाथ रखा और इस तरह मुड़कर भागे जैसे कोई चोर आकर संतरा चुराकर ले गया हो।
5
चौसर का लुत्फ़ ये है कि जिस वक़्त पो पड़े
हम बर-चहार बोले तो बर-पंज ले चला
चौसर के खेल का मज़ा यही है कि जब भी जीत का अनुकूल पासा पड़ता है, तो अगर हम चार मांगते हैं, तो वह पाँच की तरफ़ ले जाता है।
6
जिस दम 'ज़फ़र' ने पढ़ के ग़ज़ल हाथ से रखी
आँखों पे रख हर एक सुख़न-संज ले चला
जिस पल ज़फ़र ने अपनी ग़ज़ल पढ़कर हाथ से नीचे रखी, शायरी की परख रखने वाला हर शख़्स उसे आदरपूर्वक अपनी आँखों से लगाकर ले गया।
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