रोज़ मामूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र' ऐसी बस्ती को तो वीराना बनाया होता

“Every day brings ruin to this populated world, O Zafar; far better had such a settlement been made a desolate wilderness.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

ऐ ज़फ़र, इस आबाद दुनिया में हर दिन कोई न कोई ख़राबी या तबाही होती रहती है; ऐसी बस्ती से तो बेहतर यह होता कि इसे वीराना ही बनाया गया होता।

विस्तार

बहादुर शाह ज़फ़र इस शेर में दुनिया के रोज़-रोज़ के दुख, धोखे और उथल-पुथल से तंग आकर अपनी गहरी मायूसी बयान कर रहे हैं। 'मामूरा' यानी बसी हुई दुनिया और 'वीराना' यानी उजाड़ के बीच का यह विरोधाभास दिल को छू लेता है; जहाँ इंसानों की बस्ती में सुकून होना चाहिए, वहाँ हर रोज़ नई तबाही मिलती है। शायर एक ठंडी आह भरते हुए कहते हैं कि अगर आबाद रहकर भी सिर्फ़ तकलीफ़ ही झेलनी है, तो इससे कहीं बेहतर होता कि यह दुनिया बियाबान ही रहती।

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