शोला-ए-हुस्न चमन में न दिखाया उस ने वर्ना बुलबुल को भी परवाना बनाया होता

“She did not unveil the flame of her beauty in the garden, / else even the nightingale would have been turned into a moth.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

उसने बाग़ में अपने हुस्न का शोला नहीं दिखाया, वरना बुलबुल भी परवाना बनकर उस आग पर न्योछावर हो जाती।

विस्तार

इस शेर में शायर ने उर्दू शायरी के दो मशहूर आशिक़ों—बुलबुल और परवाने—का बड़ा दिलकश मुक़ाबला किया है। बुलबुल फूलों से नज़ाकत भरी मोहब्बत करती है और गीत गाती है, जबकि परवाना आग की लौ पर अपनी जान न्योछावर कर देता है। शायर महबूब के हुस्न को एक दहकते शोले की तरह पेश करते हुए कहता है कि अच्छा हुआ तुमने बाग़ में अपना यह रूप नहीं दिखाया, वरना फूलों पर चहकने वाली बुलबुल भी नग़्मे छोड़ उस आग में जल मरने वाला परवाना बन जाती।

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