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ग़ज़ल

Ishq De Naween Naween Bahar

Ishq De Naween Naween Bahar
बुल्ले शाह· Ghazal· 4 shers

यह ग़ज़ल प्रेम और आध्यात्मिकता के विरोधाभास को दर्शाती है, जहाँ कवि सांसारिक प्रेम और धार्मिक अनुष्ठानों की निरर्थकता पर सवाल उठाता है। वह बताता है कि प्रेम की खोज में, वे धार्मिक ग्रंथों और पूजा-पाठ में इतनी व्यस्त हो गए कि उन्हें सच्चे प्रेम और वास्तविक आध्यात्मिक अनुभव से दूर कर दिया गया है। अंत में, यह सांसारिक आकर्षण और प्रेम की महत्ता को स्थापित करते हुए, एक प्रेममय जीवन जीने का संदेश देती है।

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1
Jaan main sabq Ishq da parhya Masjid kolon jeyorra darya poch poch thakur dowrey warrya Jithey wajdey naad hazaar
मेरे दिल में मैंने इश्क़ का सबक सीखा, / मस्जिद से लेकर दरिया तक, राह बहुत विशाल है। / मंदिर से लेकर दरबार तक, संघर्ष बहुत बड़ा है, / जहाँ हज़ार ध्वनियाँ गूँजती हैं।
2
Ved, Quran parh parh thakey Sajdey kardiyaan ghis gaye mathey Na Rab Tayrath, na Rab Makkeh Jis paya tas nur anwaar
वेद और कुरान पढ़कर थक गए, माथे पर सजदे रगड़ दिए। न ताइरथ के रब् हैं, न मक्के के रब् हैं, जिस पर नूर और अंबर का तेज पाया।
3
Phok musaleh, bhun sat lota Na parh tasbeh, aasa, sota Ashiq kehndey dey dey hoka “Tark hlaalon, kha murdar”
फ़ोक मुसालेह, भुं सत लोटा। न परह तस्बीह, आसा, सोता। आशिक कहंदे दे दे होके, 'तर्क हलालन, खा मुर्दार।'
4
Heer Ranjhey dey hogaye meeley Bholi Heer dhondi beley Ranjhan yaar baghal wich kheyley Surt na rahya, surt sanbhaar
हीर رانجھے سے مل گئی، جب भोली हीर ने उसे ढूंढा, तो रंझा ने उसकी बाँहों में खेलना शुरू कर दिया। वह न रह पाई और न ही अपने भावों को संभाल पाई।
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