ग़ज़ल
Makkeh Gaya
Makkeh Gaya
यह ग़ज़ल एक विरह गीत है जो महके जाने के एहसास और यादों के प्रभाव को व्यक्त करता है। इसमें बताया गया है कि महके जाने के बाद भी, हवा के झोंके से यादें और बातें फिर से ताज़ा हो जाती हैं, जैसे गंगा की निर्मलता और पंखों की सुंदरता। अंत में, यह प्रेम और विरह की गहन भावना को उभारते हुए, सच्चे प्रेम की यादों को याद करने के लिए प्रेरित करता है।
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1
Makkay gayaan, gal mukdee naheen
Pawain sow sow jummay parrh aaeey
मक्का जाना कोई अंतिम बात नहीं है, भले ही सैकड़ों नमाज़ें अदा की जाएँ।
2
Ganga gayaan, gal mukdee naheen
Pawain sow sow gotay khaeeay
गंगा ज्ञान, बात मुकदी नहीं। पवन सो सो गोतय खाए।
3
Gaya gayaan gal mukdee naheen
Pawain sow sow pand parrhaeeay
गया ग्यान कल मुकदी नहीं, पावन सो सो पंद परहाए।
(अर्थ: वह भटकती हुई कला, मधुर वाणी, मौजूद नहीं है; हवा की सुगंध, प्यारा धूल कण बिखरा हुआ है।)
4
Bulleh Shah gal taeeyon mukdee
Jadon May nu dillon gawaeeay
बुल्ले शाह, जब आपने अपना सच्चा रूप दिखाया, जब आपने मई को रहस्य दिया।
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