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તે જોવા ખેલ ખરેખરો, સૌને ઉપજ્યો સ્વાદ; નટડી નાચે છે.
ત્યાં કવિ દલપતરામે કહ્યું, ધન્ય એનો ઉસ્તાદ, નટડી નાચે છે.

To witness that true spectacle, all savored the delight; the dancer performs.Then poet Dalpatram proclaimed, blessed be her master, the dancer performs.

दलपतराम
अर्थ

नर्तकी के सच्चे प्रदर्शन को देखकर सभी दर्शक आनंदित हुए। तब कवि दलपतराम ने उसके उस्ताद को धन्य कहा।

विस्तार

यह दोहा एक मोहक प्रदर्शन के सार को खूबसूरती से व्यक्त करता है। इसमें एक शानदार खेल का वर्णन है जहाँ एक नृत्यांगना सभी को मंत्रमुग्ध कर देती है, दर्शकों को खुशी और आनंद देती है। कवि दलपतराम, इस असाधारण प्रतिभा को देखकर, न केवल नृत्यांगना की बल्कि उसके गुरु की भी प्रशंसा करते हुए कहते हैं, "धन्य है उसका उस्ताद!" यह दर्शाता है कि हर महान कलाकार के पीछे एक गुरु का समर्पण और कौशल होता है जो उनकी प्रतिभा को निखारता है। यह कलाकार और उन्हें गढ़ने वाले गुरु दोनों को एक हार्दिक श्रद्धांजलि है।

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