“The fervor of the tongue causes the soul's consuming fire;Each candle here, for witness, is entirely a finger.”
ज़बान की तेज़ी जान के जलने का कारण है। यहाँ हर मोमबत्ती गवाही के लिए पूरी तरह एक उंगली है।
गर्मी है ज़बाँ की सबब-ए-सोख़्तन-ए-जाँ, हर शम' शहादत को है याँ सर-बसर अंगुश्त। Garmi-e-zaban ki sabab-e-sokhtan-e-jaan, har shama shahadat ko hai yaan sar-basar angust. ज़ुबान की गर्मी ही जान के जलने का कारण है, और यहाँ हर मोमबत्ती अपनी शहादत के लिए सिर से पैर तक एक उंगली की तरह खड़ी है। शब्द सोख़्तन-ए-जाँ का अर्थ है जान का जलना, और सर-बसर अंगुश्त का मतलब है पूरी तरह से एक उंगली के समान होना। [आह] मेरे दोस्त, ग़ालिब यहाँ एक बहुत बड़ी बात कह रहे हैं। वो कहते हैं कि हमारी अपनी ज़ुबान और हमारा जोश ही कभी-कभी हमारी बर्बादी का सबब बन जाता है। एक मोमबत्ती को देखिए, उसकी जो लौ है वो उसकी ज़ुबान की तरह है, पर वही लौ उसे धीरे-धीरे पिघलाकर खत्म कर देती है। हम भी जब अपने दिल की बात पूरी शिद्दत से कहते हैं, तो वो सच हमें अंदर से जलाता है। ये दुनिया ऐसी है जहाँ अपनी आवाज़ उठाने की कीमत हमें अपनी शांति देकर चुकानी पड़ती है। ग़ालिब कह रहे हैं कि बोलने वाला अपनी मौत की गवाही खुद अपनी ज़ुबान से दे रहा है। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई सच की खातिर ज़हर का प्याला पी ले। जैसे कहा जाता है कि दीया खुद को जलाकर ही घर रोशन करता है, वैसे ही इंसान अपनी बातों की वजह से खुद को मुश्किल में डाल लेता है। कभी-कभी हमारी अपनी रौशनी ही हमें राख कर देती है।
