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ग़ज़ल

अफ़्सोस कि दंदाँ का किया रिज़्क़ फ़लक ने

افسوس کہ دنداں کا کیا رزق فلک نے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 11 shers· radif: अंगुश्त

यह ग़ज़ल गहरे अफ़्सोस से भरी है, जिसमें तक़दीर की क्रूरता पर विलाप किया गया है जो सौंदर्य और क़ाबिलियत को निगल लेती है, जैसे मोतियों के लायक उंगलियों को 'दाँतों का रिज़्क़' बना दिया गया हो। यह व्यक्तिगत दिल टूटने के दर्द को भी बयाँ करती है, जहाँ महबूब का अँगूठी न देना और विदाई के वक़्त खाली उँगली दिखाना अस्वीकृति और अधूरे वादों का मार्मिक प्रतीक बन जाता है, जिससे नुकसान और जुदाई का गहरा एहसास उभरता है।

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1
अफ़्सोस कि दंदाँ का किया रिज़्क़ फ़लक ने जिन लोगों की थी दर-ख़ुर-ए-अक़्द-ए-गुहर अंगुश्त
अफसोस कि भाग्य ने उन लोगों की उंगलियों को दांतों का निवाला बना दिया, जिनकी उंगलियां मोतियों का हार पहनने के योग्य थीं।
2
काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देना ख़ाली मुझे दिखला के ब-वक़्त-ए-सफ़र अंगुश्त
तुम्हारा अंगूठी न देना ही काफ़ी निशानी है, सफ़र के वक़्त मुझे ख़ाली उँगली दिखाकर।
3
लिखता हूँ 'असद' सोज़िश-ए-दिल से सुख़न-ए-गर्म ता रख न सके कोई मिरे हर्फ़ पर अंगुश्त
मैं 'असद' दिल की जलन से गर्म (तीव्र) शब्द लिखता हूँ, ताकि कोई मेरे शब्दों पर उंगली न रख सके।
4
जाता हूँ जिधर सब की उठे है उधर अंगुश्त यक-दस्त जहाँ मुझ से फिरा है मगर अंगुश्त
मैं जिधर भी जाता हूँ, उधर सब की उंगली उठती है। दुनिया ने मुझसे मुँह फेर लिया है, फिर भी उंगली उठाती रहती है।
5
मिज़्गाँ की मोहब्बत में जो अंगुश्त-नुमा हूँ लगती है मुझे तीर के मानिंद हर अंगुश्त
मैं उसकी पलकों की मोहब्बत में जो लोगों की उंगलियों का निशाना बना हूँ, तो मुझे हर उंगली तीर की तरह लगती है।
6
हर ग़ुंचा-ए-गुल सूरत-ए-यक-क़तरा-ए-ख़ूँ है देखा है किसू का जो हिना-बस्ता सर-ए-अंगुश्त
हर गुलाब की कली खून की एक बूंद जैसी है। क्या किसी ने मेहंदी लगी हुई उंगली की नोक देखी है?
7
गर्मी है ज़बाँ की सबब-ए-सोख़्तन-ए-जाँ हर शम' शहादत को है याँ सर-बसर अंगुश्त
ज़बान की तेज़ी जान के जलने का कारण है। यहाँ हर मोमबत्ती गवाही के लिए पूरी तरह एक उंगली है।
8
ख़ूँ दिल में जो मेरे नहीं बाक़ी तो 'अजब क्या जूँ माही-ए-बे-आब तड़पती है हर अंगुश्त
अगर मेरे दिल में खून बाकी नहीं रहा तो इसमें अचरज क्या है? (क्योंकि) मेरी हर उँगली पानी के बिना मछली की तरह तड़पती है।
9
शोख़ी तिरी कह देती है अहवाल हमारा राज़-ए-दिल-ए-सद-पारा की है पर्दा दर-ए-अंगुश्त
तेरी शोखी हमारा हाल बता देती है। सौ टुकड़ों में टूटे दिल के राज़ की पर्दा खोलने वाली उंगली है।
10
किस रुत्बा में बारीकी-ओ-नर्मी है कि जूँ गुल आती नहीं पंजा में बस इस के नज़र अंगुश्त
इसमें किस कदर बारीकी और नर्मी है कि यह फूल की तरह हाथ में नहीं आती, बल्कि उंगली को बस इसे देखने भर का काम आता है।
11
मैं उल्फ़त-ए-मिज़्गाँ में जो अंगुश्त नुमा हूँ लगती है मुझे तीर के मानिंद हर अंगुश्त
मैं जो पलकों की मुहब्बत में बदनाम हूँ, मुझे हर उंगली तीर के समान लगती है।
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