Sukhan AI
ग़ज़ल

अर्ज़-ए-नाज़-ए-शोख़ी-ए-दंदाँ बराए-ख़ंदा है

عرض ناز شوخی دنداں برائے خندہ ہے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: है

यह ग़ज़ल मानवीय आनंद और सामाजिक दावों की विडंबना और क्षणभंगुरता को सूक्ष्मता से दर्शाती है। यह सुझाव देती है कि दाँतों की शोख़ी भरी नुमाइश (हँसी) भी सतही हो सकती है, और दोस्तों के जमावड़े का दावा भी हँसी का पात्र बन सकता है। इससे भी गहरा, यह ग़ज़ल अस्तित्व पर विचार करती है, जहाँ एक कली (अदम में) भी फूल के अंतिम परिणाम से सबक ले रही है, जो बाहरी हँसी और खुशी के पीछे छिपी एक गहरी उदासी और नश्वरता के प्रति जागरूकता का संकेत देती है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
अर्ज़-ए-नाज़-ए-शोख़ी-ए-दंदाँ बराए-ख़ंदा है दावा-ए-जम'इय्यत-ए-अहबाब जा-ए-ख़ंदा है
दाँतों की शोख़ी का नाज़ दिखाना हँसी के लिए है। दोस्तों को इकट्ठा करने का दावा करना ही हँसी की बात है।
2
है अदम में ग़ुंचा महव-ए-इबरत-ए-अंजाम-ए-गुल यक-जहाँ ज़ानू तअम्मुल दर-क़फ़ा-ए-ख़ंदा है
अस्तित्वहीनता में, कली फूल के अंतिम परिणाम की शिक्षा में लीन है। गहन चिंतन का एक पूरा संसार, घुटनों पर झुका हुआ, एक हँसी के पीछे छिपा है।
3
कुल्फ़त-ए-अफ़्सुर्दगी को ऐश-ए-बेताबी हराम वर्ना दंदाँ दर दिल अफ़्शुर्दन बिना-ए-ख़ंदा है
उदासी की पीड़ा बेचैनी के सुख को हराम कर देती है। अन्यथा, दिल में दाँत गड़ाना (अत्यधिक आंतरिक पीड़ा सहना) हँसी का आधार बन जाता।
4
शोरिश-ए-बातिन के हैं अहबाब मुंकिर वर्ना याँ दिल मुहीत-ए-गिर्या ओ लब आशना-ए-ख़ंदा है
मेरे मित्र मेरे आंतरिक कोलाहल (उथल-पुथल) से इनकार करते हैं, अन्यथा यहाँ दिल आँसुओं से घिरा हुआ है और होंठ हँसी से परिचित हैं।
5
ख़ुद-फ़रोशी-हा-ए-हस्ती बस-कि जा-ए-ख़ंदा है हर शिकस्त-ए-क़ीमत-ए-दिल में सदा-ए-ख़ंदा है
जीवन का स्वयं को बेचना या दिखावा करना केवल हँसी का पात्र है। हृदय के हर टूटे हुए मूल्य में हँसी की आवाज़ समाई हुई है।
6
नक़्श-ए-इबरत दर नज़र या नक़्द-ए-इशरत दर बिसात दो-जहाँ वुसअ'त ब-क़द्र-ए-यक-फ़ज़ा-ए-ख़ंदा है
क्या यह आँखों के सामने एक सबक या चेतावनी का निशान है या जीवन के फैलाव पर आनंद का धन? दोनों जहानों की विशालता एक मुस्कान के स्थान के बराबर है।
7
जा-ए-इस्तिहज़ा है इशरत-कोशी-ए-हस्ती 'असद' सुब्ह ओ शबनम फ़ुर्सत-ए-नश्व-ओ-नुमा-ए-ख़ंदा है
असद, जीवन की आनंदमयी कोशिशें केवल उपहास का स्थान हैं। सुबह और ओस (शबनम) हँसी के पनपने और खिलने का क्षणिक अवसर मात्र हैं।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.

अर्ज़-ए-नाज़-ए-शोख़ी-ए-दंदाँ बराए-ख़ंदा है | Sukhan AI